इंटरव्यू: ट्रैक्टर साझेदारी से बढ़ेगा खेती-किसानी का आधार

सवाल: ’ग्रामीण क्षेत्रों में उपकरण साझा करने की यह अवधारणा क्या है?

जवाब: पहले तो मैं आपको यह बता दूं कि उपकरण इसलिए साझा करना पड़ता है क्योंकि किसान वास्तव में ऐसा करना चाहते हैं। हम इस स्थिति को बढ़ाना चाहते हैं। किसानों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसके पास ट्रैक्टर या खेती के उपकरणों का अभाव है। वह इन्हें इस्तेमाल तो करना चाहता है लेकिन खरीद नहीं पाता। जबकि जिसके पास यह सुविधा है उसके अपने इस्तेमाल के बाद यह बेकार है। इसलिए इसकी आवश्यकता दोनों तरह के किसानों को है। इसी अवधारणा पर हमने अपनी पहल की शुरुआत की।

सवाल: ’इसे संगठित तौर पर कैसे शुरू किया?

जवाब: इसके लिए हमने जेफार्म सर्विसेज की शुरुआत की। जेफार्म उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, असम, राजस्थान और कई अन्य राज्यों में चल रहा है। किसानों को नामांकित करने के लिए क्षेत्र अधिकारी जिम्मेदार होते हैं। हमारे पास 200 से ज्यादा क्षेत्र अधिकारी हैं जो स्थानीय कृषि अधिकारियों के सहयोग से काम करते हैं।

सवाल: ’किसानों के लिए यह किस तरह उपयोगी है?

जवाब: सबसे बड़ी बात कि यह किसानों के लिए बिल्कुल मुफ्त है। किसान अपनी मर्जी से अपने उपकरण इस पर साझा कर सकते हैं। मसलन आपके पास ट्रैक्टर है और आप 24 घंटे तो इसका उपयोग करते नहीं। लिहाजा खाली वक्त में आप इसे किसी और को किराए पर दे सकते हैं और उस व्यक्ति से कुछ धनराशि ले सकते हैं। जेफार्म यही प्लेटफार्म उपलब्ध कराता है। अधिकांश राज्य सरकारें अपने राज्यों में जेफार्म सर्विसेज लेने के लिए उत्साहित हैं। राज्य सरकारों ने हमसे स्थानीय स्तर पर होने वाली फसलों के आधार पर प्लेटफॉर्म तैयार करने का भी अनुरोध किया है।

उदाहरण के लिए, हम न केवल असम में, बल्कि पूरे उत्तर-पूर्व में काम कर रहे हैं। केरल में हम विशेष रूप से जैविक खेती और बागवानी के लिए बात कर रहे हैं। हम उत्तर प्रदेश में पहले से ही काम कर रहे हैं जो हमारे लिए सबसे बड़े बाजारों में से एक है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी कंपनी बड़े पैमाने पर अपनी सेवा देगी। हम जेफार्म को टैफे फाउंडेशन के माध्यम से चला रहे हैं। यह कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के लिए बनाया गया फाउंडेशन है।

सवाल: ’यह एप कैसे काम करता है?

 

जवाब: हमारा एप बहुत ही सरल, लेकिन मॉडर्न है। अगर किसानों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं तो हम कॉल सेंटर के माध्यम से भी किसानों की मदद करते हैं। अब तक हमारे पास 5,000 से ज्यादा डाउनलोड दर्ज हो चुके हैं। यह एप क्षेत्रीय भाषाओं में भी है।

सवाल: ’इसका लाभ कैसे मिलेगा?

जवाब: देखिए, भारत में वर्तमान में केवल 45 लाख ट्रैक्टर हैं। इनमें अब तक सिर्फ 45 हजार यानी एक फीसद ट्रैक्टर ही इस प्लेटफॉर्म से जुड़ सके हैं। यदि इनमें से 10 फीसद ट्रैक्टर भी साझा किए जा सके तो इसका दायरा काफी बढ़ जाएगा। यह छोटे किसानों को अपनी कमाई बढ़ाने की सुविधा उपलब्ध करा सकता है। किसान अपनी कमाई को बढ़ाने के लिए नए तरीकों को सीखने में बहुत उत्सुक रहते हैं और इनमें रुचि रखते हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश, जहां हमने पहले शुरुआत की थी, अच्छा काम कर रहे हैं। ये सभी राज्य काम के आकार को 10-15 गुना तक विस्तार दे सकते हैं। अभी तक हम उत्तर प्रदेश के सिर्फ 18 जिलों और राजस्थान के 2 जिलों में काम कर रहे हैं। खेती-किसानी में ट्रैक्टर और अन्य कृषि उपकरणों की भूमिका भी काफी अहम है। सभी किसानों के पास इनका होना संभव नहीं है। इसे देखते हुए ट्रैक्टर निर्माता कंपनी टैफे ने एक अनूठी पहल की है। कंपनी किसानों के बीच ट्रैक्टर साझेदारी को बढ़ावा दे रही है। टैफे के प्रेसिडेंट व सीईओ टीआर केसवन ने कहा कि इसके लिए एक एप भी बनाया है।